“ऊँ गुं गुरभ्यो नम:” गुरु पूर्णिमा पर इस मंत्र का करें जाप, गुरु के आशीर्वाद से शिष्य के बिगड़े काम बनेंगे।

रायपुर, 3 जुलाई 2020
प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष 5 जुलाई को आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा यानि गुरु पूर्णिमा रविवार को है। गुरु पूर्णिमा को व्यास पूजा के नाम से भी जाना जाता है। गुरु पूर्णिमा का दिन अध्यात्म का ज्ञान देने वाले सद्गुरु को याद करने, उनकी पूजा करने और उनके चरणों में अपना मस्तक झुकाने का दिन होता है। भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊपर माना गया है। भारतीय समाज में सद्गुरु को अपने शिष्यों को मन, वचन और कर्म से सुधार की ओर ले जाने वाला पथ-प्रदर्शक माना गया है। गुरु की महिमा को बताते हुए भारतीय वेदों में लिखा भी गया है।
“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर: ।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः”
इसका तात्पर्य है कि गुरु ही अपने शिष्य के अज्ञान का संहार करता है। गुरु ही रुद्र का कार्य करता है। वही भ्रमादिक यानि शिव का संहारक स्वरूप धारण करने के साथ-साथ शिष्य के मन में व्याप्त यथार्थ और ज्ञान के बीच की ऊहापोह को समाप्त कर रक्षा करते हुए पालनकर्ता के रूप में विष्णु बन जाता है। अज्ञान को हटाते हुए ज्ञान की रक्षा की नई बातें सिखाता है। सृष्टि अथवा ब्रह्मा का कार्य करने के कार उसे परंब्रह्म की संज्ञा दी गई है।
गुरु का अर्थ
‘गुरु’ शब्द में ‘गु’ का अर्थ है ‘अंधकार’ और ‘रु’ का अर्थ है ‘प्रकाश’ अर्थात् गुरु का शाब्दिक अर्थ हुआ ‘अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला मार्गदर्शक’। सही अर्थों में गुरु वही है जो अपने शिष्यों का मार्गदर्शन करे और जो उचित हो उस ओर शिष्य को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे। गुरु उसको कहते हैं जो वेदशास्त्रों का गृणन (उपदेश) करता है अथवा स्तुत होता है। मनुस्मृति में गुरु की परिभाषा निम्न प्रकार दी गई-
निषेकादीनि कार्माणि य: करोति यथाविधि।
सम्भावयति चान्नेन स विप्रो गुरुरुच्यते।
अर्थात जो विप्र निषक आदि संस्कारों को यथा विधि करता है और अन्न से पोषण करता है वह ‘गुरु’ कहलाता है। इस परिभाषा से पिता प्रथम गुरु है, तत्पश्चात् पुरोहित, शिक्षक आदि। मंत्रदाता को भी गुरु कहते हैं।
आषाढ़ की पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा क्यों।
आषाढ़ की पूर्णिमा को चुनने के पीछे गहरा अर्थ है. अर्थ है कि गुरु तो पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह हैं जो पूर्ण प्रकाशमान हैं और शिष्य आषाढ़ के बादलों की तरह. आषाढ़ में चंद्रमा बादलों से घिरा रहता है जैसे बादल रूपी शिष्यों से गुरु घिरे हों. शिष्य सब तरह के हो सकते हैं, जन्मों के अंधेरे को लेकर आ छाए हैं. वे अंधेरे बादल की तरह ही हैं. उसमें भी गुरु चांद की तरह चमक सके, उस अंधेरे से घिरे वातावरण में भी प्रकाश जगा सके, तो ही गुरु पद की श्रेष्ठता है. इसलिए आषाढ़ की पूर्णिमा का महत्व है! इसमें गुरु की तरफ भी इशारा है और शिष्य की तरफ भी. यह इशारा तो है ही कि दोनों का मिलन जहां हो, वहीं कोई सार्थकता है.
15वीं सदी के मशहूर कवि कबीरदासजी ने अपनी खड़ी बोली में लिखा भी है।
“ गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय,
बलिहारी गुरु आपणें गोविंद दियो बताये”
अर्थात गुरु और गोविंद (भगवान) अगर कभी एक साथ खड़ें हों तो किसे प्रणाम करना चाहिये। गुरु को अथवा गोविंद को ? कबीरदासजी लिखते हैं कि ऐसी स्थिति में गुरु के श्रीचरणों में अपना शीश झुकाना उत्तम है, क्योंकि गुरु के कृपारूपी प्रसाद से ही गोविंद (भगवान) के दर्शन होंगे।
वैसे तो किसी भी तरह का ज्ञान देने वाला गुरु कहलाता है, लेकिन तंत्र-मंत्र-अध्यात्म का ज्ञान देने वाले सद्गुरु कहलाते हैं जिनकी प्राप्ति पिछले जन्मों के कर्मों से ही होती है। दीक्षा प्राप्ति जीवन की आधारशिला है। इससे मनुष्य को दिव्यता तथा चैतन्यता प्राप्त होती है तथा वह अपने जीवन के सर्वोच्च शिखर पर पहुंच सकता है। दीक्षा आत्मसंस्कार कराती है। दीक्षा प्राप्ति से शिष्य सर्वदोषों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है।
कुछ लोग टीचर और स्टूडेंट के रिश्ते को भी गुरु पूर्णिमा से जोड़कर देखते हैं। लेकिन असल में गुरु पूर्णिमा का संबंध आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करने वाले सद्गुरु से होता है। टीचर-स्टूडेंट के बीच का संबंध बताने के लिए प्रतिवर्ष डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है। लेकिन यहां गुरु पूर्णिमा पर गुरु-शिष्य परंपरा की बात की जाती है।
गुरु का पूरा जीवन अपने शिष्य को योग्य अधिकारी बनाने में लगता है। गुरु तो अपना कर्तव्य पूरा कर देता है, मगर दूसरा कर्तव्य शिष्य का है वह है- गुरुदक्षिणा। हिंदू धर्म में गुरुदक्षिणा का बहुत महत्व है।
गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करने के बाद जब अंत में शिष्य अपने घर जाता है तब उसे गुरुदक्षिणा देनी होती है। गुरुदक्षिणा का अर्थ कोई धन-दौलत से नहीं है। यह गुरु के ऊपर निर्भर है कि वह अपने शिष्य से किस प्रकार की गुरुदक्षिणा की माँग करे। एकलव्य और द्रोणाचार्य गुरु का रिश्ता आप जानते ही हैं। जिन्होंने गुरु के मांगने पर अपना दांये हाथ का अंगूठा काटकर गुरु के श्रीचरणों में अर्पित कर दिया था। छत्रपति शिवाजी और उनके गुरु समर्थ रामदास का रिश्ता भी आपको पता होगा। जब गुरु समर्थ रामदास के कहने पर शिवाजी अंधेरी घनघोर बरसात वाली रात में शेरनी का दूध निकालकर ले आए थे और गुरु दक्षिणा के तौर पर अपने गुरु को भेंट किया था। रामकृष्ण परमहंस के शिष्य रहे स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु की मंशानुरूप समूचे संसार में भारतवर्ष के सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार किया।
अर्जुन और गुरु द्रोणाचार्य का रिश्ता भी आप जानते हैं। युद्धभूमि में आमने-सामने आने पर अर्जुन ने गुरु के सामने हथियार डाल दिये थे। गुरु चाणक्य और उनके शिष्य चंद्रगुप्त मौर्य की कथा आपको मालूम ही है। अपने गुरु के निर्देशों का पालन करते हुए ही चंद्रगुप्त मौर्य ने नंदवंश का नाश कर निष्कंटक राज किया था।
गुरु पूर्णिमा की पूजा विधि।
गुरु पूर्णिमा के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
घर के मंदिर में किसी चौकी पर सफेद कपड़ा बिछाकर उस पर 12-12 रेखाएं बनाकर व्यास-पीठ स्थापित करें।
गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये मंत्र का जाप कीजिये
अपने गुरु की तस्वीर की अथवा साक्षात उनकी पूजा कीजिये।
अगर आप गुरु के सामने मौजूद हैं तो सबसे पहले गुरु के चरण धोयें, उन्हें तिलक लगाएं और फूल अर्पण करें, तत्पश्चात उन्हें भोजन करायें।
अब दक्षिणा देकर उनके पैर छुयें और उन्हें विदा करें।
